राधा अष्टमी पूजा विधि


राधा अष्टमी भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को, जन्माष्टमी के ठीक पंद्रह दिन बाद, श्री राधा रानी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। ब्रज परंपरा में राधा जी का जन्म मध्याह्न (दोपहर) में माना जाता है, इसलिए मुख्य पूजा दोपहर में होती है। बरसाना का श्रीजी मंदिर इस उत्सव का प्रमुख केंद्र है।
📅 राधा अष्टमी 2026 कब है? शनिवार, 19 सितंबर 2026 ✅ इस वर्ष यह पर्व बीत चुका है — अगले वर्ष की तिथि जल्द अपडेट होगी
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राधा अष्टमी पूजा सामग्री
- श्री राधा-कृष्ण की युगल प्रतिमा या चित्र (केवल राधा जी की पूजा नहीं, युगल स्वरूप की पूजा की परंपरा है)
- अभिषेक के लिए पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), गंगाजल
- राधा जी के लिए लाल/गुलाबी चुनरी, श्रृंगार सामग्री, गुलाब और कमल के फूल, फूलों की माला
- श्रीकृष्ण के लिए पीताम्बर, मोरपंख, तुलसी दल
- भोग: खीर, मालपुआ, मिश्री-माखन, फल, पंचामृत, मेवे
- चंदन, केसर, रोली, अक्षत, इत्र, धूप, घी का दीपक
राधा अष्टमी पूजा विधि — चरणबद्ध
- व्रत और संकल्प: सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें। व्रत फलाहार या एक समय भोजन के साथ रखा जाता है — परंपरा के अनुसार।
- मंडप सजाना: पूजा स्थान पर फूलों से छोटा मंडप सजाएँ और युगल प्रतिमा को चौकी पर स्थापित करें।
- मध्याह्न अभिषेक: दोपहर में पंचामृत और गंगाजल से युगल स्वरूप का अभिषेक करें। (चित्र हो तो फूल से जल छिड़कें।)
- श्रृंगार: राधा जी को चुनरी, श्रृंगार और गुलाब की माला; श्रीकृष्ण को पीताम्बर और मोरपंख अर्पित करें। केसर-चंदन का तिलक लगाएँ।
- मंत्र जप: “ॐ ह्रीं श्रीराधिकायै नमः” या सरल नाम-जप “श्री राधे, राधे” — 108 बार। राधा गायत्री: “ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात्॥”
- भोग: खीर, मालपुआ, माखन-मिश्री और फल अर्पित करें; श्रीकृष्ण के भोग में तुलसी दल रखें।
- कीर्तन और आरती: “राधे-राधे” कीर्तन, “आरती श्री वृषभानुसुता की” या युगल आरती करें।
- दान और पारण: सुहागिनों को श्रृंगार सामग्री या अन्न-वस्त्र दान करें। अगले दिन या पूजा के बाद परंपरा अनुसार पारण करें।
राधा जी का प्राकट्य और बरसाना
ब्रज की मान्यता के अनुसार राधा जी का प्राकट्य रावल गाँव में राजा वृषभानु और माता कीर्ति के यहाँ हुआ और बाद में परिवार बरसाना में बस गया। लोककथा है कि जन्म के बाद राधा जी ने आँखें तब तक नहीं खोलीं जब तक बाल कृष्ण उनके सामने नहीं आए। राधा जी को श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति माना जाता है — इसीलिए कहा जाता है कि राधा नाम के बिना कृष्ण भक्ति अधूरी है।
राधा अष्टमी पर बरसाना के लाडली जी (श्रीजी) मंदिर में सुबह अभिषेक, भोग और भव्य उत्सव होता है और लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। यात्रा का विचार हो तो भीड़, पार्किंग और मंदिर की सीढ़ियों को ध्यान में रखकर जल्दी पहुँचें।
ध्यान रखें
- ✅ राधा जी की पूजा हमेशा श्रीकृष्ण के साथ करें — युगल स्वरूप की उपासना ही ब्रज परंपरा है।
- ✅ भोग में खीर और मालपुआ विशेष प्रिय माने जाते हैं।
- ❌ राधा जी के भोग में तुलसी नहीं रखी जाती — तुलसी श्रीकृष्ण के भोग में रखें (कई ब्रज परंपराओं में)।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राधा अष्टमी की पूजा किस समय करें? (When is Radha Ashtami puja done?)
राधा जी का प्राकट्य मध्याह्न (दोपहर) में माना जाता है, इसलिए मुख्य पूजा और अभिषेक दोपहर में किया जाता है।
राधा अष्टमी पर क्या भोग लगाएँ? (What bhog on Radha Ashtami?)
खीर, मालपुआ, माखन-मिश्री, पंचामृत और फल का भोग लगाया जाता है।
राधा रानी का मंत्र क्या है? (What is Radha Rani’s mantra?)
“ॐ ह्रीं श्रीराधिकायै नमः” या सरल “श्री राधे” नाम-जप; राधा गायत्री भी पढ़ी जाती है।
राधा अष्टमी का व्रत कैसे रखें? (How to keep the fast?)
सुबह संकल्प लेकर फलाहार या एक समय भोजन के साथ व्रत रखें, दोपहर में पूजा करें और परंपरा अनुसार पारण करें।
राधा जी का जन्म कहाँ हुआ था? (Where was Radha ji born?)
ब्रज परंपरा में राधा जी का प्राकट्य रावल गाँव में राजा वृषभानु के घर माना जाता है; बाद में परिवार बरसाना में बसा।
यह पूजा विधि प्रचलित लोक-परंपरा और शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित सरल घरेलू क्रम है। अपनी कुल-परंपरा या आचार्य के निर्देश को प्राथमिकता दें।