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गणगौर पूजा विधि

📅 22 अगस्त 2026 ⏱️ 4 मिनट पढ़ने का समय
गणगौर पूजा विधि के लिए सजी पूजा चौकी और प्रमुख सामग्री

गणगौर राजस्थान का सबसे बड़ा लोकपर्व है, जिसमें गण (शिव / ईसर जी) और गौर (माता पार्वती / गौरी) की पूजा होती है। पूजा होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से शुरू होकर चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर के मुख्य दिन तक लगभग 16–18 दिन चलती है। सुहागिन महिलाएँ पति की लंबी आयु के लिए और कुंवारी लड़कियाँ मनचाहे वर के लिए यह पूजा करती हैं। मध्य प्रदेश, गुजरात और मारवाड़ी समाज में भी यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है।

📅 गणगौर 2027 कब है? शुक्रवार, 9 अप्रैल 2027   ⏳ 163 दिन बाकी

चैत्र शुक्ल तृतीया — 9 अप्रैल सुबह 3:11 से 10 अप्रैल रात 1:32 तक (जयपुर)। सिंजारा 8 अप्रैल को। सभी व्रत-त्योहार: हिंदू कैलेंडर →

गणगौर पूजा सामग्री

  • ईसर-गौर की प्रतिमा — लकड़ी की सजी प्रतिमा, या होली की राख और मिट्टी से बनी पिंडियाँ
  • दूब (दूर्वा), ताज़े फूल, हरी पत्तियाँ — पानी भरे कलश में
  • रोली, मेहंदी, काजल, हल्दी, सिंदूर (टीकियाँ लगाने के लिए), अक्षत
  • चुनरी, चूड़ियाँ, सोलह श्रृंगार की सामग्री
  • भोग: गुणे/गुने (मीठे-नमकीन), मठरी, घेवर, फल
  • मिट्टी का कुंडा/गमला — गेहूँ या जौ के जवारे बोने के लिए

16 दिन की पूजा विधि

  1. पहला दिन (धुलंडी): होलिका की राख और मिट्टी से 16 पिंडियाँ बनाकर गौरी की स्थापना की जाती है। कई घरों में इसी समय कुंडे में जवारे बोए जाते हैं।
  2. रोज़ सुबह: लड़कियाँ और महिलाएँ बगीचे से दूब और फूल लाती हैं, “गोर गोर गोमती, ईसर पूजे पार्वती…” गीत गाते हुए।
  3. दूब से जल छिड़कना: दूब को पानी में डुबोकर गौरी पर 16 बार जल के छींटे देती हैं; रोली, मेहंदी, काजल की 16-16 टीकियाँ दीवार/कागज़ पर लगाती हैं।
  4. कथा व गीत: रोज़ गणगौर की कहानी सुनी जाती है और लोकगीत गाए जाते हैं।
  5. सातवाँ दिन (शीतला सप्तमी/अष्टमी): कई क्षेत्रों में इसी दिन से लकड़ी की ईसर-गौर प्रतिमा की पूजा शुरू होती है और घुड़ला घुमाया जाता है (मारवाड़)।
  6. सिंजारा (चैत्र शुक्ल द्वितीया): नवविवाहिता के ससुराल से मेहंदी, घेवर, वस्त्र और श्रृंगार सामग्री आती है; महिलाएँ मेहंदी लगाती हैं।
  7. गणगौर (चैत्र शुक्ल तृतीया): महिलाएँ व्रत रखकर सोलह श्रृंगार करती हैं, गौरी को भोग लगाकर पानी पिलाने की रस्म करती हैं। दोपहर बाद ईसर-गौर को सिर पर रखकर शोभा यात्रा में ले जाकर तालाब, कुएँ या नदी में विसर्जन किया जाता है।
  8. व्रत का पारण: विसर्जन के बाद भोजन कर व्रत खोलें।

गणगौर की कहानी (संक्षेप)

लोककथा के अनुसार एक बार शिव-पार्वती नारद जी के साथ भ्रमण पर निकले। गाँव की साधारण स्त्रियाँ जल्दी से हल्दी-अक्षत लेकर पूजा करने आईं, तो पार्वती जी ने उन पर सौभाग्य का सारा “सुहाग” छिड़क दिया। बाद में धनी स्त्रियाँ सोने-चाँदी के थाल में पकवान लेकर आईं; तब पार्वती जी ने अपनी उंगली चीरकर अपने रक्त के छींटों से उन्हें सौभाग्य दिया। संदेश यह है कि श्रद्धा और सरल भाव ही पूजा में सबसे बड़ा है।

जयपुर और उदयपुर की गणगौर सवारी

जयपुर में सिटी पैलेस के ज़नानी ड्योढ़ी से गणगौर की शाही सवारी निकलकर त्रिपोलिया बाज़ार, छोटी चौपड़ और गणगौरी बाज़ार होते हुए तालकटोरा तक जाती है; अगले दिन बूढ़ी गणगौर की सवारी होती है। उदयपुर में पिछोला झील के गणगौर घाट पर उत्सव होता है। खाटू श्याम दर्शन के लिए जयपुर होकर आ रहे हों तो जयपुर से खाटू श्याम जी रूट देखें।

शिव-पार्वती की अन्य पूजा: हरतालिका तीज, हरियाली तीज, शिव पूजा विधि।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गणगौर पूजा कब से कब तक होती है? (Gangaur duration)

होली के अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक, लगभग 16–18 दिन।

गणगौर में ईसर और गौर कौन हैं? (Who are Isar and Gaur?)

ईसर जी भगवान शिव का और गौर (गौरी) माता पार्वती का लोक-रूप हैं।

सिंजारा क्या होता है? (What is Sinjara?)

गणगौर से एक दिन पहले का उत्सव, जब ससुराल से मेहंदी, घेवर, वस्त्र और श्रृंगार सामग्री आती है और महिलाएँ मेहंदी लगाती हैं।

क्या कुंवारी लड़कियाँ गणगौर पूजती हैं? (Do unmarried girls worship?)

हाँ, राजस्थान में कुंवारी कन्याएँ अच्छे वर की कामना से पूरे 16 दिन गणगौर पूजती हैं।

जयपुर में गणगौर की सवारी कहाँ से निकलती है? (Jaipur Gangaur procession route)

सिटी पैलेस की ज़नानी ड्योढ़ी से त्रिपोलिया बाज़ार, छोटी चौपड़ और गणगौरी बाज़ार होते हुए तालकटोरा तक।

यह पूजा विधि प्रचलित लोक-परंपरा और शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित सरल घरेलू क्रम है। अपनी कुल-परंपरा या आचार्य के निर्देश को प्राथमिकता दें।

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