मुखपृष्ठ › पूजा विधि › निर्जला एकादशी पूजा विधि

निर्जला एकादशी पूजा विधि

📅 21 अगस्त 2026 ⏱️ 4 मिनट पढ़ने का समय
निर्जला एकादशी पूजा विधि के लिए सजी पूजा चौकी और प्रमुख सामग्री

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को आती है और वर्ष की सभी 24 एकादशियों में सबसे कठिन व्रत मानी जाती है — इसमें अन्न ही नहीं, जल भी ग्रहण नहीं किया जाता। महाभारत की कथा के अनुसार भीमसेन ने यही एक व्रत किया था, इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा से यह एक व्रत करने पर वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य मिलता है। सभी एकादशी तिथियाँ एकादशी कैलेंडर में देखें।

📅 अगली तिथियाँ और शुभ समय: एकादशी कैलेंडर →

निर्जला एकादशी पूजा सामग्री

  • भगवान विष्णु का चित्र/मूर्ति, पीला वस्त्र
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें — एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ते)
  • पीले फूल, चंदन, अक्षत, धूप, घी का दीपक
  • पंचामृत, फल, मिठाई (भोग — स्वयं व्रती ग्रहण नहीं करते)
  • दान के लिए: जल भरा घड़ा/कलश, पंखा, छाता, शर्बत, फल, वस्त्र

व्रत और पूजा विधि — चरणबद्ध

  1. दशमी की तैयारी: दशमी की शाम सात्विक, हल्का भोजन करें; चावल न खाएँ।
  2. संकल्प: एकादशी को सूर्योदय से पहले स्नान कर हाथ में जल लेकर निर्जल व्रत का संकल्प लें। (स्नान और आचमन का जल व्रत भंग नहीं करता।)
  3. विष्णु पूजन: भगवान को पंचामृत स्नान कराएँ, पीला वस्त्र, चंदन, पीले फूल, तुलसी दल अर्पित करें।
  4. मंत्र जप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 108 बार या अधिक जप करें; विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  5. कथा: भीमसेन की निर्जला एकादशी कथा पढ़ें या सुनें।
  6. दान: ज्येष्ठ की गर्मी में जल भरे घड़े का दान इस एकादशी का विशेष अंग है; प्याऊ लगाना या राहगीरों को शर्बत पिलाना भी पुण्य माना जाता है।
  7. रात्रि जागरण: संभव हो तो भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें।
  8. पारण: द्वादशी को सूर्योदय के बाद, पारण समय में, पहले ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को भोजन-दान देकर जल और फिर हल्का सात्विक भोजन ग्रहण करें। हरि वासर में पारण नहीं करते।

भीमसेन की कथा (संक्षेप)

पांडवों में भीम को भूख बहुत लगती थी, इसलिए वे हर महीने एकादशी का व्रत नहीं कर पाते थे। उन्होंने महर्षि व्यास से उपाय पूछा। व्यास जी ने बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को बिना अन्न-जल के एक व्रत करने से वर्ष की सभी एकादशियों का फल मिल जाता है। भीम ने यह कठिन व्रत किया — तभी से यह भीमसेनी एकादशी कहलाती है।

किसे निर्जल व्रत नहीं करना चाहिए

  • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे
  • मधुमेह, रक्तचाप, किडनी या हृदय रोग वाले, नियमित दवा लेने वाले
  • गर्मी में बाहर काम करने वाले लोग

ऐसे लोग फलाहार या जल सहित व्रत रखें और भाव से पूजा करें — शास्त्रों में भी असमर्थ के लिए सरल विकल्प बताए गए हैं। तेज़ गर्मी में चक्कर, बेहोशी या पानी की कमी के लक्षण दिखें तो तुरंत जल लें और डॉक्टर से संपर्क करें।

ध्यान रखें

इस पूजा से जुड़े उपयोगी पृष्ठ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निर्जला एकादशी कब होती है? (When is Nirjala Ekadashi?)

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को, जो प्रायः जून में आती है।

क्या निर्जला एकादशी में पानी पी सकते हैं? (Can we drink water?)

परंपरागत रूप से द्वादशी के पारण तक जल भी नहीं लिया जाता। स्वास्थ्य कारणों से असमर्थ लोग जल या फलाहार के साथ व्रत रख सकते हैं।

इसे भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं? (Why is it called Bhimseni Ekadashi?)

क्योंकि महर्षि व्यास की सलाह पर भीमसेन ने सभी एकादशियों के फल के लिए यही एक निर्जल व्रत किया था।

निर्जला एकादशी पर क्या दान करें? (What to donate?)

जल भरा घड़ा, पंखा, छाता, शर्बत, फल और वस्त्र — गर्मी के मौसम में जल-दान को विशेष माना गया है।

पारण कब और कैसे करें? (When to break the fast?)

द्वादशी को सूर्योदय के बाद पंचांग में दिए पारण समय में, पहले दान देकर, फिर जल और हल्का सात्विक भोजन लें।

यह पूजा विधि प्रचलित लोक-परंपरा और शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित सरल घरेलू क्रम है। अपनी कुल-परंपरा या आचार्य के निर्देश को प्राथमिकता दें।

🙏 इस जानकारी को परिवार व मित्रों से शेयर करें / Share

#PujaVidhi