दीपावली लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि — संपूर्ण वैदिक विधि, मंत्र व सामग्री


दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा कार्तिक अमावस्या की शाम प्रदोष काल में की जाती है। इस पेज पर दो विधियाँ हैं। पहली 15–20 मिनट की सरल घरेलू विधि है, जो पहली बार पूजा करने वालों के लिए है। दूसरी संपूर्ण वैदिक विधि है, जिसमें पवित्रीकरण से लेकर विसर्जन तक हर चरण और उसका मंत्र दिया गया है। व्यापारियों के लिए बही-खाता, तिजोरी (कुबेर) और तराजू पूजन भी अलग से दिया गया है।
📅 दीपावली लक्ष्मी पूजा 2026: रविवार, 8 नवंबर 2026 ⏳ 11 दिन बाकी
🪔 लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (प्रदोष काल): जयपुर 6:03 PM – 7:59 PM · नई दिल्ली 5:54 PM – 7:50 PM
🌑 अमावस्या तिथि: 8 नवंबर 11:27 AM से 9 नवंबर 12:31 PM तक। दूसरे शहरों का मुहूर्त: दीपावली 2026 — शहर अनुसार मुहूर्त →
पूजा का क्रम एक नज़र में
वैदिक परंपरा में दीपावली पूजन का सही क्रम यह है: पहले विघ्नहर्ता गणेश और माता गौरी (अम्बिका), फिर कलश में वरुण देव, और उसके बाद मुख्य पूजा यानी गणेश-महालक्ष्मी। पूरे क्रम में लगने वाला अनुमानित समय नीचे है। यह समय अनुमान है; मंत्र पढ़ने की गति और परिवार की परंपरा के अनुसार कम-ज़्यादा होगा।
| क्रम | चरण | अनुमानित समय |
|---|---|---|
| 1 | पवित्रीकरण, आचमन, आसन शुद्धि, तिलक | 5 मिनट |
| 2 | स्वस्तिवाचन, मंगल श्लोक, संकल्प | 10 मिनट |
| 3 | गणेश-अम्बिका (गौरी) पूजन | 15–20 मिनट |
| 4 | कलश स्थापना व वरुण पूजन | 15 मिनट |
| 5 | गणेश-महालक्ष्मी षोडशोपचार पूजन | 25–30 मिनट |
| 6 | अंग-पूजा, अष्टसिद्धि, अष्टलक्ष्मी | 5 मिनट |
| 7 | देहली विनायक, दवात, लेखनी, बही-खाता, कुबेर, तराजू (व्यापारी) | 10–15 मिनट |
| 8 | दीपमालिका पूजन, आरती, पुष्पांजलि, क्षमा प्रार्थना, विसर्जन | 10 मिनट |
पूरी वैदिक पूजा में लगभग 1.5 से 2 घंटे लगते हैं। प्रदोष काल का मुहूर्त लगभग 2 घंटे का होता है, इसलिए चरण 1 से 4 मुहूर्त शुरू होने से पहले कर लें और मुख्य लक्ष्मी पूजन (चरण 5) मुहूर्त के भीतर करें। कम समय हो तो नीचे की सरल विधि अपनाएँ।
सरल घरेलू लक्ष्मी पूजा विधि (15–20 मिनट)
यदि आप संस्कृत मंत्रों से परिचित नहीं हैं या समय कम है, तो यह छोटा क्रम पूरी श्रद्धा से करें। शास्त्रों में भाव को मंत्र से ऊपर माना गया है।
- तैयारी: दिन में घर की सफाई करें, मुख्य द्वार पर तोरण और रंगोली बनाएँ, देहरी पर लक्ष्मी के पदचिह्न बनाएँ। शाम को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- चौकी: उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ। भक्त की ओर से देखने पर बाईं ओर गणेश जी, दाईं ओर लक्ष्मी जी रखें। मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम की ओर हो और आप स्वयं पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
- कलश: चौकी पर मुट्ठी भर चावल रखकर जल भरा कलश रखें, उसमें सुपारी और सिक्का डालें, मुख पर आम के 5 पत्ते और लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें।
- दीपक और पवित्रीकरण: घी का दीपक जलाएँ। अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कें।
- संकल्प: हाथ में जल, अक्षत, फूल और एक सिक्का लेकर अपना नाम, गोत्र और “घर-परिवार की सुख-समृद्धि के लिए दीपावली पर श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन करता/करती हूँ” बोलकर सामग्री चौकी के पास रख दें।
- गणेश पूजा: “ॐ गं गणपतये नमः” बोलते हुए जल, रोली, अक्षत, दूर्वा, फूल और लड्डू अर्पित करें।
- लक्ष्मी पूजा: “ॐ महालक्ष्म्यै नमः” बोलते हुए जल या पंचामृत छिड़कें, फिर रोली, कुमकुम, हल्दी, चुनरी, इत्र, कमल/गुलाब, कमलगट्टे, खील-बताशे, मिठाई और फल अर्पित करें।
- मंत्र जप: “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” 11, 21 या 108 बार।
- व्यापार/धन स्थान: तिजोरी, बही-खाते और कलम पर रोली से स्वस्तिक बनाकर “शुभ-लाभ” लिखें।
- दीपदान और आरती: 11 या 21 दीपक जलाकर उनकी पूजा करें, फिर परिवार सहित “ॐ जय लक्ष्मी माता” आरती करें, क्षमा माँगें और प्रसाद बाँटें। दीपकों को घर के हर कोने, रसोई, तुलसी, जल स्थान और मुख्य द्वार पर रखें।
दीपावली पूजा सामग्री की पूरी सूची
संपूर्ण वैदिक पूजा के लिए लगभग 60 वस्तुएँ लगती हैं। इन्हें उपयोग के अनुसार समूहों में बाँटा गया है ताकि ख़रीदारी आसान रहे। सरल पूजा के लिए मोटे अक्षरों वाली वस्तुएँ पर्याप्त हैं।
| समूह | सामग्री |
|---|---|
| मूर्ति व स्थापना | गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र, उनके वस्त्र, चौकी, लाल कपड़ा, आसन, गौरी के लिए गोबर/मिट्टी (या कलावा लिपटी सुपारी) |
| कलश | ढक्कन सहित कलश, आम के पत्ते (पंच पल्लव), नारियल, लाल कपड़ा, गंगाजल, स्वच्छ मिट्टी, सप्तधान्य या जौ, सर्वौषधि (या सतावर), सप्तमृत्तिका, पंचरत्न, कुश, आटा (अष्टदल बनाने के लिए) |
| तिलक व श्रृंगार | रोली, कुमकुम, चंदन, रक्त चंदन, सिंदूर, अक्षत, मौली/कलावा, जनेऊ, इत्र, अबीर-गुलाल, केसर |
| फूल व पत्र | कमल का फूल, गुलाब व अन्य फूल, माला, दूर्वा, तुलसी पत्र, कमलगट्टा |
| पंचामृत | दूध, दही, घी, शहद, शक्कर |
| नैवेद्य | खील-बताशे, खांड के खिलौने/गट्टे, मिठाई, ऋतु फल, पंचमेवा, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, ईख, सिंघाड़ा |
| दीप व धूप | 11 या 21 मिट्टी के दीपक, एक बड़ा दीपक, घी, तिल/सरसों का तेल, रुई की बत्ती, धूप/अगरबत्ती, कपूर, माचिस |
| धन पूजन | चाँदी का सिक्का, अन्य सिक्के, खड़ी हल्दी, खड़ा धनिया, बही-खाता, कलम, दवात, तराजू (व्यापारी) |
| पूजा के बर्तन | थाली, कटोरी, चम्मच, पंचपात्र व आचमनी, शंख, घंटी |
सभी पूजाओं की सामग्री एक जगह देखने के लिए: पूजा सामग्री की पूरी सूची →
संपूर्ण वैदिक दीपावली पूजा विधि (मंत्र सहित)
नीचे हर चरण को खोलकर पढ़ें। हर चरण में पहले बताया गया है कि हाथ से क्या करना है, फिर उसका मंत्र दिया गया है। मंत्र का शुद्ध उच्चारण न हो पाए तो अंत में दिया गया नाम-मंत्र (जैसे “ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः”) बोलकर भी वह उपचार किया जा सकता है।
शुरू करने से पहले: पूजा स्थान साफ़ करके गंगाजल छिड़कें। ज़मीन पर रोली या आटे से स्वस्तिक/चौक बनाएँ, उस पर थोड़े अक्षत रखें और चौकी स्थापित करें। चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी और गौरी जी (गोबर या मिट्टी से बनी, या कलावा लिपटी सुपारी) को रखें। चौकी के दाहिनी ओर घी का दीपक रखें। पति-पत्नी साथ पूजा करें तो पत्नी पति के दाहिनी ओर बैठती हैं।
चरण 1: पवित्रीकरण, आचमन, आसन शुद्धि, तिलक, शिखाबंधन
पवित्रीकरण
बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर छिड़कें।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
आचमन
दाहिनी हथेली में थोड़ा जल लेकर हर नाम के साथ एक बार, कुल तीन बार जल ग्रहण करें। फिर चौथा नाम बोलकर हाथ धो लें।
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः।
ॐ हृषीकेशाय नमः (हाथ धोएँ)।
पवित्री धारण
दाहिने हाथ की अनामिका में दो कुश और बाएँ हाथ की अनामिका में तीन कुश की पवित्री (अंगूठी) पहनें। कुश न हो तो सोने की अंगूठी पहन लें।
ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥
आसन शुद्धि
आसन पर जल छिड़कें या दोनों हाथों से उसे छुएँ।
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
तिलक
रोली-अक्षत से अपने माथे पर तिलक लगाएँ।
ॐ आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः।
तिलकं तु प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये॥
शिखाबंधन
चोटी बाँधें; चोटी न हो तो सिर के उस स्थान को छू लें।
ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥
चरण 2: स्वस्तिवाचन, देव-नमस्कार, मंगल श्लोक और संकल्प
स्वस्तिवाचन
हाथ में अक्षत और फूल लेकर गणेश जी का ध्यान करें और यजुर्वेद का यह शांति पाठ पढ़ें। पाठ के बाद अक्षत-फूल गणेश जी को अर्पित करें। पूरा पाठ न हो पाए तो पहला और अंतिम मंत्र अवश्य पढ़ें।
ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु। शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥
सुशान्तिर्भवतु। सर्वारिष्टशान्तिर्भवतु॥
देव-नमस्कार
बाएँ हाथ में अक्षत रखें और हर नाम के साथ दाहिने हाथ से थोड़े अक्षत गणेश-गौरी पर छोड़ें।
श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः। उमामहेश्वराभ्यां नमः। वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः। शचीपुरन्दराभ्यां नमः। मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः। इष्टदेवताभ्यो नमः। कुलदेवताभ्यो नमः। ग्रामदेवताभ्यो नमः। वास्तुदेवताभ्यो नमः। स्थानदेवताभ्यो नमः। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।
मंगल श्लोक
अक्षत-फूल लेकर गणेश जी के बारह नाम और इष्टदेव का स्मरण करें, फिर अक्षत-फूल अर्पित कर दें।
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः। द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
संकल्प
हाथ में पान, सुपारी, अक्षत, फूल, जल और दक्षिणा लेकर संकल्प पढ़ें। खाली स्थानों में अपनी जानकारी बोलें। 2026 के लिए: विक्रम संवत 2083, कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, अमावस्या तिथि, रविवार (भानुवासर)। संकल्प के बाद सारी सामग्री गणेश जी के सामने रख दें।
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे ______ (राज्य) ______ (नगर/ग्राम) ______ संवत्सरे कार्तिक मासे कृष्णपक्षे अमावस्यायां तिथौ ______ वासरे ______ गोत्रः ______ (अपना नाम) अहं मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य क्षेमस्थैर्यायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्ध्यर्थं धर्मार्थकाममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थं दीपोत्सवपर्वणि श्रीगणेशमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं पूजनं करिष्ये। तदङ्गत्वेन निर्विघ्नतासिद्ध्यर्थं गणेशाम्बिकापूजनं कलशस्थापनं वरुणादिपूजनं च करिष्ये।
भूमि पूजन: भूमि पर गंध, अक्षत, फूल छोड़ते हुए बोलें: “ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथाः॥ आधारशक्त्यै पृथिव्यै नमः।”
दीप पूजन: घी के दीपक के पास गंध, अक्षत, फूल छोड़ते हुए बोलें: “भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत्। यावत्कर्मसमाप्तिः स्यात् तावत्त्वं सुस्थिरो भव॥ दीपस्थदेवतायै नमः।”
चरण 3: गणेश-अम्बिका (गौरी) पूजन
हर उपचार के बाद यह नाम-मंत्र बोलें: “ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, [उपचार का नाम] समर्पयामि”, जैसे “पाद्यं समर्पयामि”, “स्नानं समर्पयामि”।
| उपचार | क्या करें | मंत्र |
|---|---|---|
| आवाहन | हाथ में अक्षत-फूल लेकर गणेश-गौरी को आमंत्रित करें | ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम। ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन। ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्॥ |
| प्रतिष्ठा | मूर्ति को छूकर अक्षत छोड़ें | ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयन्तामों प्रतिष्ठ॥ |
| आसन | आसन के रूप में फूल अर्पित करें | ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥ |
| पाद्य | चरणों के पास एक आचमनी जल | ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥ |
| अर्घ्य | जल में गंध, अक्षत, फूल मिलाकर अर्पित करें | ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥ |
| आचमन | मुख के सामने दो आचमनी जल | ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥ |
| स्नान | जल से स्नान | ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्। पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥ |
| पंचामृत स्नान | दूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रण | पञ्चामृतं मयानीतं पयो दधि घृतं मधु। शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| शुद्धोदक स्नान | फिर से शुद्ध जल से स्नान | गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥ |
| वस्त्र | वस्त्र या कलावा अर्पित करें, फिर दो आचमनी जल | शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम्। देहालङ्करणं वस्त्रमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ |
| यज्ञोपवीत | केवल गणेश जी को जनेऊ, फिर दो आचमनी जल | नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्। उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर॥ |
| चंदन | गणेश जी को चंदन, गौरी जी को रोली | श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| अक्षत | कुमकुम मिले अक्षत | अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः। मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर॥ |
| पुष्प-माला | सुगंधित फूलों की माला | माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। मयाहृतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| दूर्वा | केवल गणेश जी को 21 दूर्वा (गौरी को नहीं) | दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्। आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक॥ |
| सिंदूर | दोनों को सिंदूर | सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्। शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| अबीर-गुलाल, इत्र | अबीर-गुलाल छिड़कें, इत्र लगाएँ | नानापरिमलैर्द्रव्यैर्निर्मितं चूर्णमुत्तमम्। अबीरनामकं चूर्णं गन्धं चारु प्रगृह्यताम्॥ |
| धूप | धूपबत्ती/अगरबत्ती दिखाएँ | वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः। आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| दीप | घी का दीपक दिखाएँ | साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्॥ |
| नैवेद्य | हाथ धोकर मिठाई अर्पित करें, फिर आचमन के लिए जल | शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च। आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥ ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐ व्यानाय स्वाहा। ॐ उदानाय स्वाहा। ॐ समानाय स्वाहा। |
| ऋतुफल | मौसमी फल | इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव। तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥ |
| तांबूल | लौंग-इलायची सहित पान-सुपारी | पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्। एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| दक्षिणा | श्रद्धा अनुसार दक्षिणा | हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः। अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ |
| प्रदक्षिणा | तीन परिक्रमा (जगह न हो तो अपने स्थान पर घूमें) | यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥ |
| पुष्पांजलि | अंजलि भर फूल अर्पित करें | नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च। पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर॥ |
विशेष अर्घ्य और प्रार्थना
ताँबे के पात्र में जल, चंदन, अक्षत, फूल, फल, दूर्वा और दक्षिणा रखकर अंजलि से अर्घ्य दें।
रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षक। भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्॥
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
चरण 4: कलश स्थापना और वरुण पूजन
कलश चौकी के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) की ओर या गणेश-लक्ष्मी के सामने स्थापित करें। हर वस्तु कलश में डालते समय उसका मंत्र बोलें।
| क्रिया | क्या करें | मंत्र |
|---|---|---|
| भूमि स्पर्श | आटे से अष्टदल कमल बनाकर उस पर मिट्टी का छोटा ढेर रखें | ॐ मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभिः॥ |
| धान्य | मिट्टी पर सप्तधान्य या जौ बिखेरें | ॐ ओषधयः समवदन्त सोमेन सह राज्ञा। यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि॥ |
| कलश स्थापना | धान्य पर कलश रखें | ॐ आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः॥ |
| जल | गंगाजल या शुद्ध जल भरें | ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमा सीद॥ |
| चंदन | चंदन या सुगंध डालें | ॐ त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः। त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत॥ |
| सर्वौषधि | सर्वौषधि या सतावर डालें | ॐ या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा। मनै नु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च॥ |
| दूर्वा | दूर्वा डालें | ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च॥ |
| पंच पल्लव | आम के 5 पत्ते कलश के मुख पर | ॐ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्॥ |
| सप्तमृत्तिका | सप्तमृत्तिका या गंगा की मिट्टी | ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथाः॥ |
| सुपारी | सुपारी डालें | ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः॥ |
| पंचरत्न | पंचरत्न डालें | ॐ परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्। दधद्रत्नानि दाशुषे॥ |
| द्रव्य | सिक्का या स्वर्ण डालें | ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ |
| कलावा | कलश के गले में मौली बाँधें | ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः। वासो अग्ने विश्वरूपं संव्ययस्व विभावसो॥ |
| पूर्णपात्र | चावल भरा पात्र कलश पर रखें | ॐ पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरा पत। वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्जं शतक्रतो॥ |
| नारियल | लाल कपड़े में लिपटा नारियल पूर्णपात्र पर | ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः॥ |
वरुण आवाहन
अक्षत-फूल लेकर कलश में वरुण देव का आवाहन करें, फिर कलश पर अक्षत छोड़ते हुए तीर्थों का आवाहन करें।
ॐ तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः॥
अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्गं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि स्थापयामि। ॐ अपाम्पतये वरुणाय नमः।
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा। ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः। अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा॥
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
वरुण पूजन: ऊपर चरण 3 की तालिका के सभी उपचार (आसन से पुष्पांजलि तक) उन्हीं मंत्रों से कलश पर करें, बस नाम-मंत्र बदल दें: “ॐ भूर्भुवः स्वः वरुणाय नमः, [उपचार] समर्पयामि”। अंत में प्रार्थना करें:
नमो नमस्ते स्फटिकप्रभाय सुश्वेतहाराय सुमङ्गलाय।
सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधिनाथाय नमो नमस्ते॥
अनया पूजया वरुणाद्यावाहितदेवताः प्रीयन्तां न मम।
चरण 5: श्री गणेश-महालक्ष्मी षोडशोपचार पूजन (मुख्य पूजा)
यह दीपावली की मुख्य पूजा है और इसे प्रदोष काल के मुहूर्त के भीतर करें। लक्ष्मी जी की प्रतिमा गणेश जी के दाहिनी ओर रखें। इस पूजा की ख़ास बात यह है कि ज़्यादातर उपचारों के साथ श्रीसूक्त (ऋग्वेद के खिलसूक्त) की एक-एक ऋचा पढ़ी जाती है। हर उपचार के बाद बोलें: “ॐ लक्ष्मीगणपतिभ्यां नमः, [उपचार] समर्पयामि”।
| उपचार | क्या करें | मंत्र |
|---|---|---|
| ध्यान | फूल लेकर दोनों का ध्यान करें | गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥ या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी गम्भीरावर्तनाभिस्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया। या लक्ष्मीर्दिव्यरूपैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैः सा नित्यं पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता॥ |
| आवाहन | फूल अर्पित कर आमंत्रित करें | एह्येहि हेरम्ब महेशपुत्र समस्तविघ्नौघविनाशदक्ष। माङ्गल्यपूजाप्रथमप्रधान गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥ ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥ |
| प्रतिष्ठा | मूर्ति छूकर अक्षत छोड़ें | ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयन्तामों प्रतिष्ठ॥ |
| आसन | कमल या फूल का आसन | ॐ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥ |
| पाद्य | चरणों में जल | ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्। श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥ |
| अर्घ्य | गंध-अक्षत-फूल मिला जल | ॐ कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥ |
| आचमन | मुख के सामने जल | ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्। तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्र पद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥ |
| स्नान | जल से स्नान | ॐ आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥ |
| दुग्ध स्नान | दूध, फिर शुद्ध जल | ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्॥ |
| दधि स्नान | दही, फिर शुद्ध जल | ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयूंषि तारिषत्॥ |
| घृत स्नान | घी, फिर शुद्ध जल | ॐ घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा॥ |
| मधु स्नान | शहद, फिर शुद्ध जल | ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ |
| शर्करा स्नान | शक्कर, फिर शुद्ध जल | इक्षुसारसमुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका। मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| पंचामृत स्नान | पंचामृत, फिर शुद्ध जल | पयो दधि घृतं चैव मधुशर्करयान्वितम्। पञ्चामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| गंधोदक व शुद्धोदक | चंदन मिला जल, फिर गंगाजल; मूर्ति पोंछकर आसन पर रखें | मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्। तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| वस्त्र-उपवस्त्र | चुनरी/वस्त्र या कलावा | ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥ |
| आभूषण | गहने या श्रृंगार की वस्तुएँ | ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥ |
| गंध (चंदन) | अनामिका से केसर-कपूर मिला चंदन | ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥ |
| सिंदूर, कुमकुम | सिंदूर और कुमकुम | कुङ्कुमं कामदं दिव्यं कुङ्कुमं कामरूपिणम्। अखण्डकामसौभाग्यं कुङ्कुमं प्रतिगृह्यताम्॥ |
| अक्षत, पुष्प-माला | कुमकुम मिले अक्षत; लाल कमल या लाल फूल | ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि। पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥ |
| दूर्वा | केवल गणेश जी को | ॐ गणपतये नमः। दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि। |
| धूप | धूप दिखाएँ | ॐ कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥ |
| दीप | घी का दीपक दिखाएँ | ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे। नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥ |
| नैवेद्य | खील-बताशे, मिठाई; फिर आचमन जल | ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥ |
| ऋतुफल, तांबूल | फल, पान-सुपारी-लौंग-इलायची | ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्। सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥ |
| दक्षिणा | श्रद्धा अनुसार | ॐ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥ |
| नीराजन (आरती) | कपूर से आरती, फिर जल छोड़कर हाथ धोएँ | कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्। आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव॥ |
| प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि | तीन परिक्रमा, अंजलि भर फूल | यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्। सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥ |
अभिषेक: यदि महालक्ष्मी का विशेष अभिषेक करना हो, तो पूरा श्रीसूक्त पढ़ते हुए जल या दूध की लगातार धार से स्नान कराएँ। मिट्टी की मूर्ति पर धार न डालें, इसके लिए धातु की मूर्ति या चाँदी के सिक्के (द्रव्य-लक्ष्मी) का उपयोग करें।
प्रार्थना
भवानि त्वं महालक्ष्मीः सर्वकामप्रदायिनी। सुपूजिता प्रसन्ना स्यान्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्त्वदर्चनात्॥
अंत में जल छोड़ते हुए समर्पण करें: “कृतेनानेन पूजनेन लक्ष्मीगणपती प्रीयेताम्, न मम।”
चरण 6: अंग-पूजा, अष्टसिद्धि और अष्टलक्ष्मी पूजन
अंग-पूजा
कुमकुम मिले अक्षत-फूल से हर नाम-मंत्र के साथ देवी के उस अंग की ओर अर्पित करें।
| मंत्र | अंग |
|---|---|
| ॐ चपलायै नमः, पादौ पूजयामि | चरण |
| ॐ चञ्चलायै नमः, जानुनी पूजयामि | घुटने |
| ॐ कमलायै नमः, कटिं पूजयामि | कमर |
| ॐ कात्यायन्यै नमः, नाभिं पूजयामि | नाभि |
| ॐ जगन्मात्रे नमः, जठरं पूजयामि | उदर |
| ॐ विश्ववल्लभायै नमः, वक्षःस्थलं पूजयामि | वक्ष |
| ॐ कमलवासिन्यै नमः, हस्तौ पूजयामि | हाथ |
| ॐ पद्माननायै नमः, मुखं पूजयामि | मुख |
| ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः, नेत्रत्रयं पूजयामि | नेत्र |
| ॐ श्रियै नमः, शिरः पूजयामि | सिर |
| ॐ महालक्ष्म्यै नमः, सर्वाङ्गं पूजयामि | पूरा शरीर |
अष्टसिद्धि पूजन
पूर्व दिशा से शुरू करके घड़ी की दिशा में आठों दिशाओं में एक-एक सिद्धि को अक्षत अर्पित करें:
पूर्व: ॐ अणिम्ने नमः · आग्नेय: ॐ महिम्ने नमः · दक्षिण: ॐ गरिम्णे नमः · नैऋत्य: ॐ लघिम्ने नमः · पश्चिम: ॐ प्राप्त्यै नमः · वायव्य: ॐ प्राकाम्यै नमः · उत्तर: ॐ ईशितायै नमः · ईशान: ॐ वशितायै नमः
अष्टलक्ष्मी पूजन
उसी क्रम में आठों दिशाओं में आठ लक्ष्मियों को अक्षत अर्पित करें:
ॐ आद्यलक्ष्म्यै नमः · ॐ विद्यालक्ष्म्यै नमः · ॐ सौभाग्यलक्ष्म्यै नमः · ॐ अमृतलक्ष्म्यै नमः · ॐ कामलक्ष्म्यै नमः · ॐ सत्यलक्ष्म्यै नमः · ॐ भोगलक्ष्म्यै नमः · ॐ योगलक्ष्म्यै नमः
चरण 7: व्यापारियों के लिए — देहली विनायक, दवात, लेखनी, बही-खाता, कुबेर, तराजू
ये पूजन घर में वैकल्पिक हैं, पर दुकान और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में दीपावली का अभिन्न अंग हैं।
देहली विनायक
दुकान या घर के मुख्य द्वार की दीवार पर सिंदूर से “ॐ श्रीगणेशाय नमः”, स्वस्तिक और “शुभ-लाभ” लिखें। फिर गंध-फूल अर्पित करते हुए बोलें: “ॐ देहलीविनायकाय नमः”।
दवात (महाकाली) पूजन
स्याही की दवात (या आजकल कलम) को लक्ष्मी जी के सामने फूल-अक्षत के ढेर पर रखें, सिंदूर से स्वस्तिक बनाएँ और मौली बाँधें। “ॐ श्रीमहाकाल्यै नमः” बोलकर पूजन करें।
कालिके त्वं जगन्मातर्मसिरूपेण वर्तसे। उत्पन्ना त्वं च लोकानां व्यवहारप्रसिद्धये॥
लेखनी पूजन
कलम पर मौली बाँधकर सामने रखें और “ॐ लेखनीस्थायै देव्यै नमः” बोलकर गंध-फूल अर्पित करें।
लेखनी निर्मिता पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना। लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम्॥
बही-खाता (सरस्वती) पूजन
नए बही-खाते या हिसाब की डायरी के पहले पन्ने पर रोली या केसर-चंदन से स्वस्तिक बनाएँ और “शुभ-लाभ” लिखें। फिर “ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः” बोलकर पूजा करें।
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
कुबेर (तिजोरी) पूजन
तिजोरी या धन रखने की अलमारी पर स्वस्तिक बनाएँ, कुबेर का आवाहन करें और “ॐ कुबेराय नमः” बोलकर पूजन करें। फिर पूजा में रखी हल्दी की गाँठ, धनिया, कमलगट्टा, सिक्के और दूर्वा की एक छोटी थैली बनाकर तिजोरी में रखें।
आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरु। कोशं वर्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर॥
धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसम्पदः॥
तुला (तराजू) पूजन
तराजू पर सिंदूर से स्वस्तिक बनाकर मौली लपेटें और “ॐ तुलाधिष्ठातृदेवतायै नमः” बोलकर गंध-अक्षत अर्पित करें।
चरण 8: दीपमालिका पूजन, आरती, पुष्पांजलि, क्षमा प्रार्थना और विसर्जन
दीपमालिका पूजन
एक थाली में 11, 21 या अधिक दीपक जलाकर लक्ष्मी जी के पास रखें। “ॐ दीपावल्यै नमः” बोलकर गंध-फूल अर्पित करें और खील, ईख, सिंघाड़ा जैसे पदार्थ चढ़ाएँ। फिर ये दीपक पूरे घर में रखें।
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारकाः। सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः॥
श्री लक्ष्मी जी की आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता। सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पत्ति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता। कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता। सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता। खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता। रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता। उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
मंत्र पुष्पांजलि
दोनों हाथों में फूल लेकर पढ़ें और अर्पित करें:
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
क्षमा प्रार्थना
प्रदक्षिणा और साष्टांग प्रणाम के बाद हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूलों के लिए क्षमा माँगें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
फिर बोलें “ॐ अनेन यथाशक्त्यर्चनेन श्रीमहालक्ष्मीः प्रसीदतु” और जल छोड़ें। बड़ों को प्रणाम करें, फिर चरणामृत और प्रसाद बाँटें।
विसर्जन
अक्षत लेकर नई गणेश-लक्ष्मी प्रतिमा को छोड़कर बाकी सभी आवाहित देवताओं का विसर्जन करें:
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च॥
लक्ष्मी पूजा का भाव और कथा
मान्यता है कि समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु का वरण किया। दीपावली पर उनकी पूजा “अंधकार से प्रकाश” और “परिश्रम से अर्जित धन के सम्मान” का प्रतीक है। गणेश जी के साथ पूजा का अर्थ है कि धन बुद्धि और विवेक के साथ ही टिकता है। इसी कारण श्रीसूक्त में देवी से केवल धन नहीं, बल्कि “अलक्ष्मी” (दरिद्रता, भूख, कलह) को घर से दूर करने की प्रार्थना की गई है। परंपरा कहती है कि लक्ष्मी वहाँ ठहरती हैं जहाँ स्वच्छता, सत्य, परिश्रम और दान हो। वे केवल पूजा से नहीं, आचरण से भी प्रसन्न होती हैं।
क्या करें, क्या न करें
- ✅ मुख्य लक्ष्मी पूजन प्रदोष काल के मुहूर्त में ही करें; तैयारी वाले चरण पहले पूरे कर लें।
- ✅ पूजा के बाद कुछ दान अवश्य करें — अन्न, दीपक या वस्त्र।
- ✅ पूजा का बड़ा घी का दीपक सुरक्षित स्थान पर रात भर जलने दें।
- ❌ पूजा के समय घर में झगड़ा, नशा या जुआ न करें; जुआ धार्मिक परंपरा नहीं है।
- ❌ जलते दीपक बिना देखे न छोड़ें; पटाखों और दीपकों से सुरक्षा का ध्यान रखें।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दीपावली 2026 में लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त क्या है? (Lakshmi Puja muhurat 2026)
रविवार, 8 नवंबर 2026 को प्रदोष काल में। जयपुर में 6:03 PM से 7:59 PM और नई दिल्ली में 5:54 PM से 7:50 PM तक। अमावस्या तिथि 8 नवंबर 11:27 AM से 9 नवंबर 12:31 PM तक है; शाम की अमावस्या केवल 8 नवंबर को है, इसलिए पूजा 8 नवंबर को ही होगी।
दीपावली पर पहले किसकी पूजा होती है? (Whose puja comes first on Diwali?)
वैदिक क्रम में सबसे पहले गणेश-अम्बिका (गौरी) पूजन, फिर कलश स्थापना और वरुण पूजन, और उसके बाद मुख्य गणेश-महालक्ष्मी पूजन होता है। अंत में व्यापारी बही-खाता, कुबेर और तराजू का पूजन करते हैं।
संपूर्ण वैदिक लक्ष्मी पूजा में कितना समय लगता है? (How long does the full puja take?)
लगभग 1.5 से 2 घंटे (अनुमान)। मुहूर्त छोटा होता है, इसलिए पवित्रीकरण, संकल्प, गणेश-गौरी पूजन और कलश स्थापना मुहूर्त से पहले कर लें और मुख्य लक्ष्मी पूजन मुहूर्त के भीतर करें। सरल घरेलू विधि 15–20 मिनट में हो जाती है।
लक्ष्मी जी की मूर्ति गणेश जी के किस तरफ रखें? (Which side of Ganesh should Lakshmi be placed?)
लक्ष्मी जी को गणेश जी के दाहिनी ओर रखा जाता है। भक्त की ओर से देखने पर बाईं ओर गणेश जी और दाईं ओर लक्ष्मी जी दिखेंगी।
क्या बिना पंडित के घर पर दीपावली पूजा कर सकते हैं? (Can we do Diwali puja at home without a pandit?)
हाँ। इस पेज की सरल विधि परिवार स्वयं कर सकता है। संस्कृत मंत्र कठिन लगें तो हर उपचार के साथ नाम-मंत्र “ॐ महालक्ष्म्यै नमः” बोलकर वह वस्तु श्रद्धा से अर्पित करें।
गौरी जी को दूर्वा क्यों नहीं चढ़ाते? (Why is durva not offered to Gauri?)
परंपरा में दूर्वा विशेष रूप से गणेश जी को अर्पित की जाती है। गणेश-अम्बिका पूजन में दूर्वा केवल गणेश जी को चढ़ाई जाती है और गौरी जी को रोली, सिंदूर और फूल अर्पित किए जाते हैं।
विसर्जन में किन देवताओं का विसर्जन नहीं करते? (Which deities are not sent off in visarjan?)
नई स्थापित गणेश और महालक्ष्मी की प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता; वे घर में ही रहती हैं। बाकी आवाहित देवताओं (जैसे कलश में वरुण) का अक्षत छोड़कर विसर्जन किया जाता है।
लक्ष्मी पूजा का मुख्य मंत्र क्या है? (What is the main Lakshmi mantra?)
“ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” — इसे 11, 21 या 108 बार जपें। श्रीसूक्त का पाठ भी दीपावली पर विशेष माना जाता है।
क्या दीपावली पर नई मूर्ति लेना ज़रूरी है? (Is a new idol necessary on Diwali?)
कई परिवारों में हर दीपावली नई मिट्टी की लक्ष्मी-गणेश मूर्ति लाने की परंपरा है, पर पुरानी धातु की मूर्ति या चित्र से भी पूजा की जा सकती है। अपनी कुल-परंपरा का पालन करें।
मंत्र वैदिक और पौराणिक परंपरा से लिए गए हैं; विधि का क्रम प्रचलित शास्त्रीय पूजा-पद्धति पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में क्रम और सामग्री में अंतर होता है — अपनी कुल-परंपरा या आचार्य के निर्देश को प्राथमिकता दें। मुहूर्त Drik Panchang (जयपुर व नई दिल्ली) से मिलाया गया है।