वट सावित्री पूजा विधि


वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाएँ पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए रखती हैं। उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा) में यह ज्येष्ठ अमावस्या को मनाया जाता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में यही व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के रूप में होता है। इस दिन बरगद (वट) वृक्ष की पूजा और सावित्री-सत्यवान की कथा का विशेष महत्व है। अमावस्या पर ही शनि जयंती भी पड़ती है।
📅 वट सावित्री व्रत 2027 कब है? शुक्रवार, 4 जून 2027 ⏳ 219 दिन बाकी
ज्येष्ठ अमावस्या — 4 जून सुबह 4:06 से 5 जून रात 1:10 तक (IST)। इसी दिन शनि जयंती। सभी व्रत-त्योहार: हिंदू कैलेंडर →
बरगद की पूजा क्यों?
मान्यता है कि सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस पाए थे। वट वृक्ष दीर्घायु और अमरता का प्रतीक है; परंपरा में इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास माना जाता है।
पूजा सामग्री
- सावित्री-सत्यवान का चित्र या मिट्टी की प्रतिमा
- कच्चा सूत (कच्चा धागा) / मौली — परिक्रमा में लपेटने के लिए
- बाँस का पंखा, लाल चुनरी, सोलह श्रृंगार की सामग्री
- रोली, सिंदूर, हल्दी, अक्षत, फूल, धूप, दीपक
- भीगे काले चने, फल (आम, खरबूजा आदि मौसमी), पूरी-पुए/गुलगुले, मिठाई
- जल भरा लोटा, बरगद के पत्ते, बायना/दान की टोकरी
पूजा विधि — चरणबद्ध
- स्नान व श्रृंगार: प्रातः स्नान कर नए या लाल वस्त्र पहनें, सोलह श्रृंगार करें और व्रत का संकल्प लें।
- वट वृक्ष के पास: पूजा की टोकरी लेकर बरगद के पेड़ के पास जाएँ। (पास में पेड़ न हो तो बरगद की टहनी गमले में लगाकर घर पर पूजा कर सकते हैं।)
- जल अर्पण: वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएँ; सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा रखें।
- पूजन: रोली, हल्दी, सिंदूर, अक्षत, फूल, चने, फल और पकवान अर्पित करें; बाँस के पंखे से वृक्ष को हवा करें।
- परिक्रमा: कच्चा सूत वृक्ष के तने पर लपेटते हुए 7, 11, 21 या 108 परिक्रमा करें (परंपरा के अनुसार)।
- कथा: सावित्री-सत्यवान की कथा पढ़ें या सुनें।
- सास का आशीर्वाद: भीगे चने, फल, वस्त्र और कुछ दक्षिणा का बायना निकालकर सास या घर की बड़ी महिला को देकर पैर छुएँ।
- पारण: कई परंपराओं में भीगे चने के 11 दाने निगलकर व्रत खोला जाता है; फिर भोजन करें।
सावित्री-सत्यवान की कथा (संक्षेप)
मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने राज्य खो चुके राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से विवाह किया, यह जानते हुए भी कि नारद जी के अनुसार सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है। नियत दिन वन में लकड़ी काटते समय सत्यवान वट वृक्ष के नीचे गिर पड़े और यमराज उनके प्राण ले चले। सावित्री उनके पीछे-पीछे चलीं। उनकी पतिभक्ति, धैर्य और बुद्धिमानी भरे संवाद से प्रसन्न होकर यमराज ने वर माँगने को कहा — सावित्री ने सास-ससुर की नेत्र-ज्योति और राज्य, पिता के लिए पुत्र, और अंत में स्वयं के लिए सत्यवान से सौ पुत्रों का वर माँगा। वचनबद्ध यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े।
ध्यान रखें
- ✅ गर्भवती या अस्वस्थ महिलाएँ फलाहार के साथ व्रत रखें।
- ✅ पेड़ की टहनियाँ न तोड़ें; पूजा के बाद प्लास्टिक और कचरा वहीं न छोड़ें।
- ✅ इसी दिन शनि जयंती भी होती है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वट सावित्री व्रत कब होता है? (When is Vat Savitri Vrat?)
उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को; महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के रूप में।
वट सावित्री में कितनी परिक्रमा करें? (How many parikrama?)
परंपरा के अनुसार 7, 11, 21 या 108 परिक्रमा कच्चा सूत लपेटते हुए की जाती है। अपने परिवार की रीत का पालन करें।
बरगद का पेड़ पास न हो तो पूजा कैसे करें? (No banyan tree nearby?)
बरगद की टहनी गमले में लगाकर या उसका चित्र रखकर घर पर ही विधि से पूजा और कथा कर सकते हैं।
वट सावित्री व्रत में क्या खाएँ? (What to eat?)
परंपरा में व्रत के बाद भीगे चने, फल और पूरी-पुए खाए जाते हैं। कई महिलाएँ 11 चने निगलकर व्रत खोलती हैं।
क्या कुंवारी लड़कियाँ वट सावित्री व्रत रख सकती हैं? (Can unmarried girls keep it?)
परंपरागत रूप से यह सुहागिनों का व्रत है, पर कुछ क्षेत्रों में अच्छे वर की कामना से कुंवारी कन्याएँ भी पूजा करती हैं।
यह पूजा विधि प्रचलित लोक-परंपरा और शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित सरल घरेलू क्रम है। अपनी कुल-परंपरा या आचार्य के निर्देश को प्राथमिकता दें।