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देवशयनी एकादशी पूजा विधि

📅 22 अगस्त 2026 ⏱️ 3 मिनट पढ़ने का समय
देवशयनी एकादशी पूजा विधि के लिए सजी पूजा चौकी और प्रमुख सामग्री

देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल एकादशी) से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में जाते हैं। इसी दिन से चातुर्मास आरंभ होता है, जो कार्तिक शुक्ल देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है। इसे हरिशयनी, पद्मा और महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी भी कहते हैं — पंढरपुर की वारी यात्रा इसी दिन विठ्ठल दर्शन पर पूरी होती है। सभी तिथियाँ एकादशी कैलेंडर में।

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पूजा सामग्री

  • भगवान विष्णु की मूर्ति/चित्र, छोटी शय्या या पलंग (सुलाने के लिए), पीला/सफ़ेद बिछावन
  • पीला वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल (पहले दिन तोड़ा हुआ), चंदन
  • पंचामृत, फल, मिठाई, घी का दीपक, धूप
  • शंख, घंटी

पूजा विधि — चरणबद्ध

  1. स्नान व संकल्प: प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें (निराहार, फलाहार या एक समय — सामर्थ्य अनुसार)।
  2. विष्णु पूजन: पंचामृत स्नान, पीला वस्त्र, चंदन, पुष्प, तुलसी दल अर्पित करें; भोग लगाएँ।
  3. मंत्र: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप; विष्णु सहस्रनाम का पाठ।
  4. शयन कराना: शाम या रात को भगवान की मूर्ति को सजी हुई शय्या पर लिटाएँ, ओढ़नी ओढ़ाएँ और शयन मंत्र पढ़ें:
    “सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम्॥”
    (हे जगन्नाथ, आपके सोने पर यह जगत सोता है और आपके जागने पर समस्त चराचर जागता है।)
  5. आरती व जागरण: आरती करें, भजन-कीर्तन करें।
  6. पारण: द्वादशी को पारण समय में दान देकर व्रत खोलें।

चातुर्मास — चार महीने के नियम

देवशयनी से देवउठनी तक (श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक) परंपरागत रूप से:

  • विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
  • संत-साधु एक ही स्थान पर रहकर प्रवचन करते हैं (चातुर्मास व्रत)।
  • कई लोग एक वस्तु (जैसे श्रावण में हरी सब्ज़ी, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में दाल) का त्याग करते हैं — यह स्थानीय परंपरा पर निर्भर है।
  • भजन, जप, दान, सात्विक भोजन और ब्रह्मचर्य पर ज़ोर।

इसी अवधि में गुरु पूर्णिमा, सावन, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि और दीपावली जैसे बड़े त्योहार आते हैं — पूजा-पाठ पर कोई रोक नहीं है, केवल मांगलिक संस्कार टाले जाते हैं।

कथा (संक्षेप)

पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार सूर्यवंशी राजा मान्धाता के राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। अंगिरा ऋषि की सलाह पर राजा ने प्रजा सहित आषाढ़ शुक्ल (पद्मा) एकादशी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से वर्षा हुई और अकाल समाप्त हुआ।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवशयनी एकादशी कब होती है? (When is Devshayani Ekadashi?)

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को, जो प्रायः जून-जुलाई में आती है।

चातुर्मास कब से कब तक होता है? (Chaturmas duration)

देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी तक, लगभग चार महीने।

चातुर्मास में शादी क्यों नहीं होती? (Why no weddings in Chaturmas?)

मान्यता है कि इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए विवाह जैसे मांगलिक संस्कार देवउठनी एकादशी के बाद किए जाते हैं।

आषाढ़ी एकादशी और देवशयनी एकादशी एक ही हैं? (Is Ashadhi Ekadashi the same?)

हाँ, महाराष्ट्र में इसे आषाढ़ी एकादशी कहते हैं; इस दिन पंढरपुर में विठ्ठल-रुक्मिणी के दर्शन के लिए वारी पूरी होती है।

भगवान को शयन कैसे कराएँ? (How to put the Lord to rest?)

पूजा के बाद मूर्ति को सजी छोटी शय्या पर लिटाकर ओढ़नी ओढ़ाएँ, शयन मंत्र पढ़ें और आरती करें।

यह पूजा विधि प्रचलित लोक-परंपरा और शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित सरल घरेलू क्रम है। अपनी कुल-परंपरा या आचार्य के निर्देश को प्राथमिकता दें।

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